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नक्सलवाद के आगे नतमस्तक क्यों हैं ये सरकार?

 

नक्सलवाद के आगे नतमस्तक क्यों हैं ये सरकार?

झारखंड राज्य को अस्तित्व में आए दो दशक से ज्यादा का समय हो गया। इस दौरान बहुत सी चीज़ों में बदलाव आए लेकिन बहुत से मुद्दे अभी भी जस के तस हैं। इन्हीं में से एक मुद्दा है नक्सलवाद। नक्सलवाद झारखंड के माथे पर लगा एक बदनुमा दाग है, जिसे पिछली कुछ सरकारों ने मिटाने की कोशिश भी की और काफी हद तक कामयाब भी हुईं। पर मौजूदा सरकार के दौर में राज्य में फैली अराजकता ने इन नक्सलवादियों के भी हौसले बढ़ा दिए हैं।

 

हर दिन बढ़ रहे हैं नक्सलवादियों के हौसले

*    मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक झारखंड बनने से ले कर साल 2019 तक कुल 846 नक्सलियों को मौत के घाट उतारा गया है। मगर ये सिलसिला यहीं थम गया। मौजूदा झारखंड सरकार नक्सलियों में अपना भय स्थापित कर पाने में नाकाम साबित हो रही है।

 

*     झारखंड के 24 में से 18 ज़िले आज भी नक्सलवाद से प्रभावित हैं। ये ज़िले हजारीबाग, लोहरदगा, पलामू, चतरा, गढ़वा, रांची, गुमला, सिमडेगा, लातेहार, गिर्डीह, कोडरमा, बोकारो, धनबाद, सिंहभूमि, सरायकेला, खरसावा, खूंटी और रामगढ़रे हैं।

 

*     नक्सलवादी, स्थानीय निवासियों के पिछड़ेपन, अशिक्षा, गरीबी और सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं से लोगों की दूरी का फायदा उठाकर, आर्थिक मदद कर के या डरा धमका कर अपने मंसूबे सफल करते हैं। झारखंड सरकार की कल्याणकारी योजनाओं का दूरस्थ आदिवासी क्षत्रों तक न पहुँच पाना भी नक्सलवाद के बने रहने की प्रमुख वजहों में से एक है।

 

*     पिछले पांच सालों में झारखंड सरकार ने इन नक्सली इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए एक भी बड़ी पुनर्वास योजना नहीं चलाई। राज्य सरकार को चाहिए कि खास तौर पर नक्सली प्रभावित इन इलाकों में आधुनिक सुख सुविधाएं पहुंचा कर और इन इलाकों का विकास कर के यहाँ के लोगों को देश की मुख्यधारा में लेकर आए, तभी इस समस्या का प्रभावी और निर्णायक समाधान निकल सकता है। पर इस मुद्दे पर सरकार की शिथिलता ये बताने के लिए काफी है कि सरकार इस मुद्दे को लेकर गंभीर ही नहीं है।

 

*     राज्य की पुलिस ने साल 2022 में 113 नक्सलियों की लिस्ट जारी की थी, जो पुलिस प्रशासन के लिए गले की फांस बन चुके थे। इन नक्सलियों पर एक लाख से लेकर एक करोड़ तक का इनाम भी घोषित किया गया लेकिन इनमे से कई नक्सली आज भी पुलिस की पहुँच से दूर हैं।

 

राजनीतिक प्रतिबद्धता की कमी से नहीं हो रहा समस्या का समाधान

 

*    भाकपा माओवादी, पीपुल्स लिबरेशन फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएलएफआइ), तृतीय सम्मेलन प्रस्तुति कमेटी (टीएसपीसी), झारखंड जन मुक्ति परिषद् (जेजेएमपी) व झारखंड प्रस्तुति कमेटी (जेपीसी), ये कुछ नक्सलीय संगठन झारखंड में सक्रिय हैं और नक्सल समस्या से झारखंड की मुक्ति की राह में रोड़ा हैं।

 

*    मौजूदा झारखंड सरकार की इन नक्सलीयों को लेकर ज़रूरत से ज्यादा अहिंसावादी रुख अपना रही है। झारखंड सरकार इन नक्सलीयों को मुख्यधारा से जोड़ने के आत्मसमर्पण करने का पूरा मौक़ा देना चाहती है। नक्सलियों को भयाक्रांत कर इस मामले का इच्छित हल खोजा जाना चाहिए। इसके लिए सरकार को आक्रामक रुख अपनाते हुए ‘शठे शाठ्यम समाचरेत की नीति अपनानी चाहिए।

 

*    याद रहे कि सोरेन बाबू ने जिस दिन मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, उसी दिन भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी माओवादी ने अडकी थाना क्षेत्र के सेल्दा में स्थित सामुदायिक भवन को बम से उड़ाकर अपने इरादे स्पष्ट कर दिए थे।

 

*    साल 2019 यानी सोरेन सरकार के पहले साल में ही नक्सलियों ने 15 जिलों में 133 नक्सली हमलों की वारदात को अंजाम दिया। साल 2019 में ही पुलिस और नक्सलियों के बीच मुठभेड़ की कुल 36 घटनाएं हुई जिसमें पुलिस के जवानों के अलावा आम नागरिकों की भी जानें गयीं।

 

*    इसी साल अलग अलग जिलों में नक्सलियों द्वारा कुल 22 हत्याएं की गयीं। इसके अलावा 26 जगहों पर आगजनी, दो अपहरण और विस्फोट की कुल 13 वारदातों को अंजाम दिया गया। इसके अलावा पुलिस पर 4 बार बम से हमले किये गये।  

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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