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बिन आमदनी आदिवासियों का जीना दुश्वार

 

बिन आमदनी आदिवासियों का जीना दुश्वार

जिम्मेदार कौन है, बताइए सरकार

जल, जंगल और ज़मीन के इस झारखंड की पहचान हैं ये आदिवासी| ये आदिवासी ही झारखण्ड की संस्कृति के वाहक और संरक्षक हैं| पर आज ये तथाकथित 'आदिवासियों की हितैषी' सरकार भी झारखण्ड में आदिवासियों के हितों की रक्षा कर पाने में असमर्थ है| हाल ही में प्रोफेशनल असिस्टेंस फॉर डेवलपमेंट एक्शन (प्रदान) द्वारा जारी की गयी रिपोर्ट में ये खुलासा हुआ है कि झारखंड में 75 फीसदी से भी ज्यादा आदिवासी परिवार ऐसे हैं जिनकी सामूहिक आय 5000 रूपये प्रति माह से भी कम है| भारत सरकार के केन्द्रीय जनजाति मंत्रालय और झारखंड सरकार के कल्याण विभाग को सौंपी गयी इस रिपोर्ट में बताया गया है कि झारखंड के एक आदिवासी परिवार की कुल आया प्रतिवर्ष 60000 के आस पास है|

 

·       झारखण्ड सरकार की पक्षपातपूर्ण नीतियों के कारण झारखण्ड का आदिवासी समुदाय आज हर तरह की सुविधाओं से वंचित है और अन्धकार में अपनी गुज़र बसर करने को मजबूर है| केंद्र सरकार द्वारा आवंटित की गयी वो राशि जो आदिवासी कल्याण कोष में जानी चाहिए थी, उसे झारखण्ड सरकार द्वारा अन्य मदों में खर्च कर दिए जाने से 21वीं सदी के विकसित भारत का उजाला झारखण्ड के आखिरी आदिवासी तक नहीं पहुँच पा रहा है|

 

·       झारखण्ड और उडीसा में सामूहिक रूप से हुआ ये सर्वेक्षण लगभग 5000 आदिवासी परिवारों के बीच किया गया जिसमें 16 जिलों के कुल 240 आदिवासी बहुल गाँव को चिन्हित कर शामिल किया गया| सर्वेक्षण के बाद इसके नतीजे तक पहुँचने के लिए कई बुद्धिजीवियों और शिक्षाविदों की मदद ली गयी जिससे कई चौकाने वाले तथ्य निकल कर सामने आये| भारत के एक सामान्य किसान परिवार की वार्षिक आय जहाँ 122616 रूपये प्रतिवर्ष है वहीँ झारखंड के आदिवासी इलाकों में ये आंकड़ा अधिक से अधिक 75 हज़ार रूपये के करीब है|

 

·       इसके अलावा सर्वेक्षण में बताया गया है कि झारखंड के आदिवासी परिवारों की कुल आय शेष ग्रामीण भारत की कुल आय के 60 प्रतिशत के बराबर है| ये आंकड़े झारखंड के आदिवासी की दुर्गति को दिखाने के लिए पर्याप्त हैं|          

 

·       प्रदान की रिपोर्ट के अनुसार झारखंड में कुल 6132 आदिवासी परिवारों को ही झारखण्ड सरकार की ओर से मिलने वाली पेंशन का लाभ मिल पाता है| वहीँ करीब 30130 आदिवासी परिवार ऐसे हैं जिनकी आय का एकमात्र स्रोत परंपरागत खेती ही है| संस्था द्वारा जारी किये गये आंकड़ों के अनुसार झारखंड से 15158 आदिवासी हर वर्ष रोज़गार की तलाश में राज्य से बाहर दूसरे राज्यों में जाना पड़ता है| 

 

·       उपर्युक्त आंकड़े ये बताने को काफी हैं कि वर्तमान सरकार में आदिवासियों का हित कितना सुरक्षित है| आज के इस 21वीं सदी के भारत में झारखंड का आदिवासी आज भी 15वीं सदी में जीने को मजबूर है| 5000 रुपयों में इज्ज़त की जिंदगी को कल्पना है, अपनी आधारभूत ज़रूरतें पूरी कर पाना भी संभव नहीं है| ओरें बाबू या तो जनता के बीच आकर ये बताएं कि आदिवासियों की इस बदहाल स्थिति का ज़िम्मेदार कौन है, या फिर इसकी ज़िम्मेदारी खुद लेते हुए मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफ़ा दें|

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