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कृष्ण की पुकार है ये भागवत का सार है कि युद्ध ही तो वीर का प्रमाण है कौरवों की भीड़ हो या पांडवों का नीड हो जो लड़ सका है वो ही तो महान है

 

कृष्ण की पुकार है

ये भागवत का सार है

कि युद्ध ही तो वीर का प्रमाण है

कौरवों की भीड़ हो

या पांडवों का नीड हो

जो लड़ सका है वो ही तो महान है

वर्तमान सोरेन सरकार में झारखण्ड का बहुसंख्यक यानी हिंदू समुदाय सुरक्षित नहीं है। सोरेन सरकार की मुस्लिम तुष्टिकरण की नीतियों से मुस्लिम कट्टरवादियों और चरमपंथियों के हौसले सातवें आसमान पर हैं। झारखण्ड में जगह जगह हिंदू समुदाय को टारगेट कर उन पर हमले की घटनाएं आजकल आम होती जा रही हैं। सोरेन सरकार न केवल इसपे चुप्पी साधे हुए है बल्कि पर्दे के पीछे से शय भी दे रही है। कहीं ऐसा न हो कि आने वाले दिनों में झारखंड से हिंदुओं का समूल नाश हो जाए और बस इन जेहादियों का ही बोलबाला रहे।

    सबसे ताज़ा घटना हाल ही में रांची के साहिबगंज क्षेत्र की है जहाँ सोरेन बाबू की पुलिस द्वारा आरएसएस के एक कार्यकर्ता अनुराग आनंद को पीट पीट कर अधमरा कर दिया गया। झारखंड में बढ़ते इस्लामिक अतिवाद की गवाही देता एक और मामला रामगढ़ ज़िले का है जहाँ मुस्लिम समुदाय के कुछ युवकों ने कॉलेज परिसर में घुसकर हिंदू छात्राओं के साथ बदसलूकी की। छात्र-छात्राओं के विरोध करने पर इन युवकों ने परिवार के साथ मिलकर छात्रों को बेरहमी से पीटा।

ये तो महज़ कुछ नमूने भर हैं, पूरा झारखंड ऐसे घटनाओं से भरा पड़ा है।  ये बानगी है कि किस तरह से इस्लामिक अतिवाद झारखण्ड में अपने पैर पसार रहा है।

हिंदुत्व कभी हिंसा का पक्षधर नहीं रहा पर अन्याय और अधर्म का विरोध करने के लिए शस्त्र उठाने से रोकता भी नहीं है। तुलसी बाबा ने रामचरित मानस में लिखा है

बिनय न मानत जलधि जड़ गए तीन दिन बीत

बोले राम सकोप तब भय बिनु होय न प्रीत

हिंदू समुदाय को ये समझ जाना चाहिए कि अनुनय विनय का समय अब बीत चुका है।






क्या है वक़्फ़? और क्या है उसकी मान्यताएँ

* 'वक़्फ़' शब्द अरबी भाषा के 'वक़ूफ़'  शब्द का रूपांतरण है जिसका अर्थ है 'ठहराव'

* किसी भी व्यक्ति द्वारा 'अल्लाह' के नाम पर दान की गयी कोई भी सम्पति वक़्फ़ की मानी जाती है। ये संपत्तियाँ आम तौर पर मस्जिद, मदरसे, जमीन, खेत, कब्रिस्तान आदि कुछ भी तो सकती हैं।

* वक़्फ़ की संपत्तियों की खरीद-फ़रोख़्त नहीं की जा सकती, न ही इसका स्थानांतरण संभव है। इसके अलावा एक बार जो संपत्ति वक़्फ़ की हो जाती है, वो हमेशा वक़्फ़ की ही रहती है।

क्या है भारत में वक़्फ़ की संरचना?

* भारत में वक़्फ़ की संपत्तियों का लिखित दस्तावेज़ीकरण 12वीं सदी के बाद से मिलता है। मध्यकालीन भारत में सुल्तान और बादशाह ही वक़्फ़ की संपत्तियों के सर्वे-सर्वा होते थे।

* आज़ादी के बाद पूरे देश में बिखरी हुई वक़्फ़ की संपत्तियों के आंकलन और रखरखाव के लिए एक संरचना या ढांचे की ज़रूरत महसूस हुई।

* इसे दृष्टिगत रखते हुए भारतीय संसद ने सन् 1954 में वक़्फ़ एक्ट पास किया जिसके परिणामस्वरूप सबसे पहले वक़्फ़ बोर्ड का गठन हुआ।

* 1955 से राज्यों में वक़्फ़ बोर्ड के गठन का प्रावधान हुआ। इस कानून के तहत एक राज्य में दो वक़्फ़ बोर्ड हो सकते हैं: शिया वक़्फ़ बोर्ड, सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड। वर्तमान में भारत के राज्यों में 32 वक़्फ़ बोर्ड मौजूद हैं।

* वर्तमान में केंद्रीय वक़्फ़ बोर्ड की संरचना इस प्रकार है। 1 चेयरपर्सन, राज्य सरकार द्वारा मनोनीत 2 सदस्य, जिसमें आम तौर पर एक विधायक, एक सांसद। इसके अलावा 1 टाउन प्लानर, 1 वकील, 1 बुद्धिजीवी, एक सर्वे कमिश्नर होते हैं।

* इसके अलावा डेप्युटी सेक्रेटरी रैंक का एक आइएएस अधिकारी भी शामिल होता है। एक वक़्फ़ बोर्ड का कार्यकाल 5 साल का होता है। ये केंद्रीय वक़्त समिति वक़्फ़ से जुड़े मुद्दों पर भारत सरकार को सलाह देती है।

कितनी है वक़्फ़ की सम्पत्ति

* अगस्त 2022 की एक मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक भारत में वक़्फ़ संपत्तियों की कुल संख्या 851535 है। जो कि लगभग आठ लाख वर्ग किलोमीटर के क्षेत्रफल में फैली हुई हैं।

* सबसे अधिक वक़्फ़ संपत्तियों वाले राज्य की बात करें तो उत्तर प्रदेश पहले नम्बर पर है। इसके बाद पश्चिम बंगाल का नम्बर दूसरा है। वक़्फ़ संपत्तियों के मामले में पंजाब और तमिलनाडु का स्थान भी अग्रणी है।

* इन संपत्तियों में हर तरह की चल अचल संपत्ति जैसे दान की जमीनें, मस्जिदें, कब्रिस्तान, मदरसे आदि शामिल हैं।

यहाँ फँसता है पेंच

* वक़्फ़ से संबंधित मुद्दों के लिए वक़्फ़ बोर्ड ट्रिब्यून नाम से एक अलग न्यायालय की व्यवस्था है। वक़्फ़ की संपत्ति से जुड़े मसले यहाँ सुलझाए जाते हैं।

* अगर वक़्फ़ बोर्ड को संदेह है कि अमुक सम्पत्ति पर वक़्फ़ बोर्ड का हक होना चाहिए तो बोर्ड इस मसले का स्वतः संज्ञान लेकर भूमि का सर्वे करा कर फैसला सुना सकता है।

* वक़्फ़ बोर्ड के फैसले के खिलाफ अपील की प्रक्रिया भी काफी जटिल है। कुल मिलाकर यही आम धारणा है कि वक़्फ़ बोर्ड ट्रिब्यूनल का फैसला ही अंतिम फैसला होता है।

* सबसे बड़ा विवाद इसी बात को लेकर है कि भले ही वक़्फ़ बोर्ड की आमदनी उतनी न हो, पर उसके पास अथाह संपत्ति है। और इन जमीनों का करना क्या है, इसका फैसला भी वर्तमान कानून के मुताबिक वक़्फ़ बोर्ड के सिवा और कोई दूसरा व्यक्ति या संस्था नहीं कर सकती।

वक़्फ़ बोर्ड को लेकर सरकार का क्या है रुख

* पिछली सरकारों ने वक़्फ़ बोर्ड की कार्यप्रणाली पर बिल्कुल भी दखल नहीं देती थी। पर मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक वर्तमान केंद्र सरकार द्वारा वक़्फ़ बोर्ड की कार्यप्रणाली में अमूलचूल और सकरात्मक परिवर्तन करने की संभावनाएं हैं।

* केंद्र सरकार नया कानून लाकर वक़्फ़ बोर्ड में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करना चाहती है।

* इसके अलावा देश की अदालतों को ये तय करने का हक होगा कि अमुक संपत्ति पर वक़्फ़ का हक है या नहीं।

* इसके अलावा नये कानून के तहत ऐसा प्रावधान बनाया जाएगा जिसमें वक़्फ़ की संपत्तियों का ज़िला प्रशासन के पास पंजीयन ज़रूरी हो जाएगा।

हाल के दिनों में वक़्फ़ बोर्ड की मनमानी के कुछ ऐसे मामले सामने आए हैं जिससे ऐसा प्रतीत होता है कि वक़्फ़ बोर्ड की शक्तियों को नियन्त्रित करना लोकतंत्र के हित में है।

कुर्सी है तुम्हारी ये जनाज़ा तो नहीं है

कुछ कर नहीं सकते तो उतर क्यूँ नहीं जाते

युवाओं को उनकी योग्यता अनुसार रोज़गार उपलब्ध करा पाने में हेमंत सोरेन सरकार पूरी तरह से नाकाम रही है। नतीजा ये है कि युवाओं की आँखों के सपने, आँसुओं में तब्दील होते जा रहे हैं और संवेदनहीन झारखंड सरकार के कानों में जूं नहीं रेंगता।

अव्वल तो वेकेन्सी नहीं आती। वेकेन्सी आ भी गयी तो पेपर लीक का डर भी साथ आता है। परीक्षा हुई, तो रिजल्ट के इंतज़ार में बच्चों की आँखें पथरा जाती हैं, पर रिज़ल्ट नहीं आता।

पर क्या करें हेमंत बाबू! ये भूख न कमबख़्त रोज़ लगती है। ये डिग्रियाँ, सड़क पर रिक्शा चलाने, चौराहों पर ठेला-खोमचा लगाने से रोक देती हैं। सवालों से डर के शर्म के मारे युवा साल-साल भर गाँव- घर नहीं जा पाते। गाँव में बुजुर्ग माँ बाप की आँखें अपनी ही औलाद की एक झलक पाने को तरसती हैं। दिल पर पत्थर नहीं, पहाड़ है ये। इस पीड़ा का ज़रा भी अंदाज़ा है आपको?

क्या हक है सोरेन साहब को युवाओं के भविष्य के साथ छेड़खानी करने का?  युवाओं की भावनाओं का सरेआम मज़ाक बनाने का अधिकार हेमंत बाबू आपको किसने दिया? क्या युवाओं के आँसुओं की गर्मी से आपका दिल ज़रा भी नहीं पसीजता? उस पर भी कमाल ये कि सत्ता और कुर्सी से आपका मोहभंग नहीं हो रहा। धिक्कार है।

सरकार की लापरवाही के बीच कैसे बदल रही है झारखंड की डेमोग्राफी

झारखंड के आदिवासी जल, जंगल और जमीन के इस राज्य की सबसे बड़ी पहचान हैं। केवल पहचान ही नहीं, आदिवासी, झारखंड की संस्कृति के वाहक हैं। इसलिए झारखंड की संस्कृति बची रहे, इसके लिए आदिवासियों का अस्तित्व बचा रहना ज़रूरी है। पर आदिवासियों की जनसंख्या दिन प्रतिदिन घटती जा रही है।

वर्तमान में आदिवासियों की जनसंख्या पर सबसे बड़ा ग्रहण साबित हो रहा है असम और बंगाल के रास्ते हो रही 'अवैध बंग्लादेशी घुसपैठ'। ये मामला जितना सीधा दिखता है, है उतना ही संगीन, जिसका उद्देश्य झारखंड से आदिवासियों का सर्वनाश है।

    स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि झारखंड की डेमोग्राफ़ी तक बदलने लगी है। ज्यादा दिन ऐसा चला तो ये आदिवासियों के अस्तित्व पर संकट सिद्ध होगा। इस समस्या पर झारखंड की तथाकथित 'आदिवासी हितैषी' सरकार की खामोशी समझ से परे है। वो तो भला हो माननीय उच्च न्यायलय का, कि ये चीजें लोगों के संज्ञान में आईं। आइये सिलसिलेवार तरीके से जानते हैं कि कैसे 'बांग्लादेशी घुसपैठ' आदिवासियों के अस्तित्व पर संकट सिद्ध हो रहा है।

* आंकड़ों की मानें तो 2001 से 2011 के बीच पाकुड़ जिले में आदिवासियों की संख्या में 11 प्रतिशत की कमी आई है, वहीं मुस्लिम समाज के लोगों की संख्या 37 फीसदी बढ़ी है।

* गृहमंत्रालय की एक रिपोर्ट के मुताबिक घुसपैठ कर अवैध रूप से झारखंड आए बांग्लादेशी घुसपैठियों के फ़र्ज़ी दस्तावेज तैयार करने के लिए बड़े पैमाने पर फर्जी वेबसाइटें चलाई जा रही हैं। जिसमें उनके नकली आधार कार्ड, मतदाता पहचान पत्र, जन्म और निवास प्रमाण पत्र यहाँ तक कि फर्जी पासपोर्ट तक बनाए जा रहे हैं। ऐसी फ़र्ज़ी वेबसाइटों की संख्या 120 के आस पास है। इस तरह इन बांग्लादेशी घुसपैठियों के जाली दस्तावेज बनवा कर इन्हें झारखण्ड में विधिवत बसाए जाने की योजना बनाई जा रही है।

* झारखण्ड के कानून Santhal Pargana Tenent Act के तहत आदिवासी अपनी ज़मीन न तो किसी को बेच सकते हैं, न ही लीज़ पर दे सकते हैं। ये बांग्लादेशी घुसपैठिये आदिवासी लड़कियों से विवाह कर, उनसे जबरन धर्मपरिवर्तन करा लेते हैं और उनकी ज़मीन भी हथिया लेते हैं। इसके अलावा गिफ्ट डीड के तहत भी ये घुसपैठिये ज़मीन पर कब्ज़ा कर ले रहे हैं।

* इस तरह की ज़मीनों पर अवैध रूप से हथियार बनाए जा रहे हैं। इसी तरह की असामाजिक गतिविधियों के लिए ऐसी भूमि उपयोग में लाई जाती है।

* हाल ही में संथाल इलाके के एक विधायक ने अपने विधानसभा क्षेत्र में 8 से 10 हज़ार मुस्लिम मतदाताओं के अचानक बढ़ जाने की शिकायत चुनाव आयोग में दर्ज कराई थी।

* इसके अलावा एक सोची समझी रणनीति के तहत ये बांग्लादेशी घुसपैठिये, विभिन्न जनप्रतिनिधि पदों पर बैठी आदिवासी महिलाओं से शादी कर उनका धर्मपरिवर्तन करा देते हैं।

इससे पहले की ये बांग्लादेशी घुसपैठिये झारखंड से आदिवासियों और उनकी परंपरागत संस्कृति को लील जाएं, ज़रूरी है कि समय रहते इनकी अवैध घुसपैठ पर सख़्ती से लगाम लगाई जाए।

पार्टी एक परिवार नहीं

परिवार ही पार्टी

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बुलंदी पर इन्हें मिट्टी की खुशबू तक नहीं आती

ये वो शाख़ें हैं जिनको शजर (पेड़) अच्छा नहीं लगता

दिशोम गुरु शिबू सोरेन की कोशिशों ने आदिवासी समुदाय को अलग राज्य झारखंड तो दे दिया, पर सवाल ये है कि क्या अलग राज्य बन जाने भर से ही आदिवासियों के उद्देश्यों की पूर्ति होती है? जवाब है नहीं। पर क्यों नहीं? क्योंकि झारखण्ड बनने के बाद शिबू बाबू की पार्टी को राज-काज रास आने लगा और वो उन आदिवासियों के इलाकों का रास्ता भूल गयी जिनके नाम का इस्तेमाल कर के उन्होंने संसद की सीढियाँ चढ़ी थीं। नतीजा ये कि आदिवासियों के लिए विकास की जो राह खुलनी चाहिए थी, वो दरवाज़ा बंद होता चला गया। वर्तमान में दो ढाई दशक बाद आज भी आदिवासी, इस तथाकथित 'आदिवासी हितैषी' सरकार में ख़ुद को ठगा-ठगा सा महसूस कर रहे हैं।

    इन बीस-पच्चीस सालों में केवल वक्त बदला है, झामुमो सरकार की कार्यशैली नहीं। और एक चीज़ जो नहीं बदली वो है आदिवासियों की किस्मत। और आज के हालात तो ये हैं कि झारखण्ड के लोगों की किस्मत पर परिवारवाद और वंशवाद का ग्रहण लग चुका है। परिवारवाद का ये दीमक झारखण्ड की राजनीति को धीरे धीरे अंदर से खोखला कर रहा है।

   झारखण्ड के विकास का सपना ले राजनीति में आई झामुमो ने विकास तो किया है, पर झारखण्ड का नहीं, अपना, अपने परिवार का। इतना ही नहीं वंशवाद की ये बेल झारखण्ड की किस्मत पर इस तरह छा गयी है कि समृद्धि और विकास के सूरज की रौशनी झारखण्ड तक पहुँच ही नहीं पा रही है। झामुमो में परिवारवाद हमेशा से हावी रहा है। अंतर सिर्फ ये है कि झामुमो पहले 'पिता-पुत्र द्वय' की पार्टी थी, जो कि अब 'पति-पत्नी द्वय' की हो गयी है। पार्टी को अपना परिवार बनाने की बजाए, इस त्रयी ने अपने परिवार की ही पार्टी बना ली।

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