सरकार की जनहितकारी योजनाओं का जनता को नहीं मिल रहा लाभ – 27 सितम्बर
हजारों योजनाओं के हर दिन यहाँ बादल उमड़ते हैं
सबब क्या है कि इन चेहरों का पीलापन नहीं जाता
झारखंड सरकार की तथाकथित कल्याणकारी योजनाओं से जनता का कल्याण नहीं हो पा रहा है| कारण ये है कि ये योजनाएं महज़ कागज़ और कलम तक ही सीमित हैं| कागजों में ही जन्म लेती हैं, कागजों में ही दफ्न हो जाती हैं| ज़्यादातर हकीकत की शक्ल में ज़मीन पर उतर ही नहीं पातीं| जो योजनाएं ज़मीन तक पहुँचती भी हैं, जनता उन तक नहीं पहुँच पाती क्योंकि जनता को सरकारी चक्रव्यूह में पहले से फँसी हुई है|
ये है झाखंड सरकार की महत्वाकांक्षी योजनाओं की ज़मीनी हकीकत
सिंचाई कूप योजना किसी बड़ी धांधली का संकेत
· सरकार की ओर से पूरे राज्य में करीब 64 हज़ार कुँए स्वीकृत हैं| इनमें से 5809 कुँए अकेले रांची के लिए स्वीकृत हैं| 2 साल पहले तक एक कुँए के निर्माण की लागत 3 लाख 53 हज़ार रूपये थी| जिसे हाल में बढाकर 4 लाख 24 हज़ार रूपये कर दिया गया है| यहाँ तक तो सब ठीक ही लगता है| मगर रुकिए! ये महज़ दावा है| हकीकत कुछ और ही है|
· इन स्वीकृत 64 हज़ार कुओं में से महज़ 47 हज़ार कुओं का ही निर्माण कार्य शुरू हो पाया| और उनमें से भी महज़ 6 हज़ार कुँओं का ही निर्माणकार्य पूरा हो पाया है| हो रही इस देरी का क्या कारण है इसका संज्ञान लेने वाला कोई नहीं है| न ही सचिवालय से इस विषय को लेकर किसी तरह का कोई जवाब तलब किया गया, न ही इस देरी को लेकर किसी अधिकारी पर कोई गाज गिरी| ये योजना बस अधर में लटकी हुई है| लगता है कि कुँआ खोदा तो जनता के लिए जाना था, पर इसका मीठा पानी झारखंड की अफसरशाही पी रही है|
खाद्य सुरक्षा योजना के राशन से भर रहा है किसी और का पेट
· बोकारो का हाल भी इससे अलग नहीं है| बस योजना का नाम बदला है, हाल वही है| यहाँ के लोगों का आरोप है कि उन्हें पिछले 2 महीनों से राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा योजना के तहत ठीक से राशन नहीं मिल रहा है| पूर्वी सिंहभूमि में लोगों को राशन लेने के लिए 35 किलोमीटर दूर से आना पड़ता है| राशन डीलर 'राशन नहीं आया' बोल के 2-2 दिन बाद आने को कहता है| उसके बावजूद राशन नहीं दिया जाता| बता दें कि सम्बंधित विभाग ने "अभी तक मामला हमारे संज्ञान में नहीं आया है" बोल के इस समस्या से अपना पल्ला झाड़ लिया है|
बिना बकरा खिलाए नहीं आते 'आवास योजना' के पैसे, आये भी तो हो जाते हैं गायब
· ऐसे आश्चर्य झारखंड में होते रहते हैं| ये मामला साहिबगंज का है| आवास योजना के एक लाभार्थी के खाते में आई 1 लाख 20 हज़ार रूपये की रकम निकाल ली गयी और खाताधारक को इस बारे में कोई सूचना ही नहीं है| मामला उस वक़्त थोडा साफ़ हुआ जब अगले कुछ दिलों में गाँव के प्रधान के नये भवन का निर्माण शुरू हुआ| कथित आरोप है कि आवास योजना में बिचौलियों का खेल खूब चलता है| बिना पंचायक सेवक और इन बिचौलियों को बकरा खिलाए, खाते में पैसे नहीं आते| लाभार्थी का आरोप है कि बिचौलिए और प्रधान ने मिल कर उनके पैसों का गबन कर लिया|
· अबुआ आवास योजना में तो एक आवास के लिए कई बकरे लगते हैं| बकरों के अलावा अधिकारियों से 'यथाशक्ति चढ़ावा' भी चढ़ाना पड़ता है| इस योजना के तहत गिरदीह में कई महिलाओं से 20-20 हज़ार रूपये लिए गये हैं| अन्य जगहों की भी हालत यही है, बस आवास का रेट थोडा ऊपर नीचे हो सकता है|
लम्बी है धांधली की फेहरिस्त
· गिरडीह में ही सरकारी स्कूल बनाने के लिए आवंटित की गयी धनराशि से इमारत तो बन गयी पर स्कूल अभी तक शुरू नहीं हो पाया है| अन्य स्कूलों में मराम गोमके जयपाल सिंह मुंडा छात्रवृत्ति योजना के पैसे आवंटित कर दिए गये पर ये पैसे विद्यार्थियों के खातों में जाने की बजाए शायद कहीं और चले गये|
· जामताड़ा में कई स्वास्थ्य केंद्र महीनों से बंद पड़े हैं| इसका इस्तेमाल अब मरीजों के इलाज के लिए नहीं होता| इसलिए स्थानीय लोग यहाँ अपने पालतू पशुओं को शायद इस सोच से बाँधते हैं कि कम से कम ये इमारत किसी काम तो आए|
मुख्यमंत्री जी यदि सचमुच जनता के हितैषी हैं तो उन्हें जल्द से जल्द इन घटनाओं का संज्ञान लेकर सरकारी कार्यप्रणाली में व्याप्त इन विसंगतियों को दूर करना चाहिए|
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