लव और लैंड के बाद आखिर क्या बला है ये लेबर जेहाद
ये पूरी दुनिया मेहनत करने वालों के दम पर पर ही चलती है, इस बात की कोई काट नहीं है| आदम गोंडवी का एक शेर है कि कहते हैं कि 'भूखे पेट का मज़हब केवल रोटी होता है|' सच ही है, मेहनतकशों की कोई ज़ात नहीं होती| सुबह कुंआ खोदेंगे तो शाम को पानी पीएंगे| पर कुछ ऐसे फिरकापरस्त लोग हैं जो हर बात को मज़हब के चश्मे से देखते हैं| ऐसा ही कुछ झारखंड में भी देखने को मिला| आइये पूरा मामला विस्तार से समझते हैं|
· झारखण्ड देश का एक ऐसा राज्य है जहाँ से एक बड़ी संख्या में दैनिक मजदूर पलायन कर के, रोज़गार की तलाश में दूसरे राज्यों में जाते हैं| हाल के कुछ सालों में झारखंड से पलायन कर दूसरे राज्यों में जाने वाले कुछ मजदूरों के लापता होने की घटनाएं सामने आईं हैं| प्रथमदृष्टया तो ये घटनाएं सामान्य ही लगीं| पर अगले कुछ महीनों में ऐसी ही कुछ और घटनाओं के सामने आने के बाद मजदूरों के गायब होने का एक चलन यानी कि पैटर्न सा बनता दिखा| पैटर्न ये कि ये सारे मजदूर झारखंड के आदिवासी इलाकों से ही आते हैं| इतना ही नहीं, इन सभी मजदूरों के ठेकेदार मुस्लिम समुदाय से आते हैं| दरअसल होता ये है कि ये (मुस्लिम) ठेकेदार झारखंड के आदिवासी इलाकों के भोले भाले मजदूरों को ज्यादा पैसों में काम दिलाने का लालच देकर दूसरे राज्यों, खास तौर पर जम्मू कश्मीर या लेह लाद्दाख जैसे दूर दराज वाले इलाको में ले कर जाते हैं| यहाँ पर काम तो दिलाते हैं पर काम पूरा होने के बाद पैसे नहीं देते| यानी कि उनसे बेगारी कराई जाती है| ऐसे मजदूर वापस लौट कर कभी अपने घर भी नहीं जा पाते| झारखण्ड के आदिवासी इलाकों में इस तरह से मजदूरों के लापता होने के एक दो नहीं कई दर्जन मामले अब तक सामने आ चुके हैं| दावे के साथ ये कह पाना भी मुमकिन नहीं है कि ये मजदूर अब जीवित और सही सलामत हैं भी या नहीं| ये भी संभव है कि उन्हें किसी गैरकानूनी काम में लगा दिया जा रहा हो|
· इस तरह की ज़्यादातर घटनाएं झारखण्ड के दुमका क्षेत्र में हुई हैं| एक मामला दुमका ज़िले के काठीकुंड थाना क्षेत्र के जलाना गाँव का है| जहाँ एक ही गाँव के तीन परिवार के पुरुषों को आलम अंसारी नाम के एक ठेकेदार द्वारा काम दिलाने के बहाने जम्मू कश्मीर ले जाया गया| इसके बाद ये लोग दोबारा लौटकर न तो अपने गाँव आए न तो इनकी कोई खबर ही आई| ये लोग कैसे हैं? हैं भी या नहीं है? इन सबके बारे में किसी को कोई जानकारी नहीं है| पुलिस ने मामला दर्ज तो कर लिया कर कार्यवाही की रफ़्तार वैसी ही सुस्त है| मुस्लिम ठेकेदार का भी कोई अता पता नहीं है| इस घटना को हुए बरसों बीत चुके हैं| अब तो परिवार वालों को अपने परिजनों के लौटने की उम्मीद तक नहीं है|
· उसी गाँव की एक महिला मनी किस्कू बताती हैं कि उनके पति शिवधन मुर्मू, जो कि ऐसी ही घटना का शिकार हुए थे, चार साल बाद भी अभी तक घर वापस नहीं लौटे हैं| गाँव के एक अन्य पुरुष डेहरी मरांडी का भी मामला इसी से मिलता जुलता है|
· मीडिया रिपोर्ट्स की माने तो दुमका ज़िले और उसके आसपास के इलाकों में कुल 130 के लगभग मुस्लिम ठेकेदार सक्रिय हैं| इसमें से मसलिया में 23, दुमका में 14, टोंगरा में 12, रामगढ़ में 6, झरमुन्डी में 5 और जामा में 4 मुस्लिम ठेकेदार काम कर रहे हैं| आदिवासी इलाकों में फैली गरीबी और अशिक्षा का फायदा उठा कर ये ठेकेदार यहाँ को मजदूरों को बरगलाकर दूर, दूसरे शहर ले कर जाते हैं और वहां या तो बेगारी या फिर बहुत कम पैसों में काम करवाते हैं|
· स्थानीय थाणे ने तो इस घटना में मात्र गुमशुदगी की, साधारण सी रिपोर्ट दर्ज की है, मामला इतना साधारण नहीं, बल्कि इससे कहीं ज्यादा संगीन है| झारखंड के आदिवासी इलाकों में मुस्लिमों की लगातार बढती जनसँख्या और बदलती हुई डेमोग्राफी के बीच इस तरह की घटनाएं किसी बहुत बड़ी साजिश की ओर इशारा कर रही हैं|
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