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Showing posts from 2020

1/6/2020 Pranayam for life's good प्राणायाम जो बदल दे जीवन

Kapalabhati: Keep the waist straight in Kapalabhati and sit in Siddhasana and keep both hands in the Jana Mudra. Exhale rapidly through the nose and pull the stomach in and out. Keep in mind that do not take breath, only leave. This will automatically inhale. Benefits: Helps to eject toxins from the body. Asthma, weight loss, constipation, acidity, stomach diseases are away. Increases immunity and cleans the respiratory tract. Helps to activate the brain. • Bhastrika: The literal meaning of Bhastrika is the blower. Sounding like a blower, pure air is taken in and impure air is thrown out. Sitting in Siddhasana, keep neck and back straight. Breathe in fast and release. Keep in mind that flatulence should be taken while inhaling and contraction should be done while exhaling. Benefits: Increases lung function. Vata, Pitta, removes the defects of Kapha. Obesity, asthma and respiratory diseases are away. It is also beneficial in nervous diseases. • Ujjayi Pranayama: Sitt...

1 जून/पुण्य-तिथि भगतसिंह की वीर माता विद्यावती कौर

1 जून/पुण्य-तिथि       भगतसिंह की वीर माता विद्यावती कौर इतिहास इस बात का साक्षी है कि देश, धर्म और समाज की सेवा में अपना जीवन अर्पण करने वालों के मन पर ऐसे संस्कार उनकी माताओं ने ही डाले हैं। भारत के स्वाधीनता संग्राम में हंसते हुए फांसी चढ़ने वाले वीरों में भगतसिंह का नाम प्रमुख है। उस वीर की माता थीं श्रीमती विद्यावती कौर। विद्यावती जी का पूरा जीवन अनेक विडम्बनाओं और झंझावातों के बीच बीता। सरदार किशनसिंह से विवाह के बाद जब वे ससुराल आयीं, तो यहां का वातावरण देशभक्ति से परिपूर्ण था। उनके देवर सरदार अजीतसिंह देश से बाहर रहकर स्वाधीनता की अलख जगा रहे थे। स्वाधीनता प्राप्ति से कुछ समय पूर्व ही वे भारत लौटे; पर देश को विभाजित होते देख उनके मन को इतनी चोट लगी कि उन्होंने 15 अगस्त, 1947 को सांस ऊपर खींचकर देह त्याग दी। उनके दूसरे देवर सरदार स्वर्णसिंह भी जेल की यातनाएं सहते हुए बलिदान हुए। उनके पति किशनसिंह का भी एक पैर घर में, तो दूसरा जेल और कचहरी में रहता था। विद्यावती जी के बड़े पुत्र जगतसिंह की 11 वर्ष की आयु में सन्निपात से मृत्यु हुई। भगतसिंह 23 वर्ष की आयु में फांसी च...

जयतु जयतु भारतम' (Jayatu Jayatu Bharatam)

जयतु जयतु भारतम' (Jayatu Jayatu Bharatam)  https://youtu.be/7ZpsOy9wq-A https://youtu.be/7ZpsOy9wq-A गीत को देशभर के प्रसिद्ध 211 गायकों ने मिलकर गाया है, जिसकी शुरुआत सिंगर आशा भोसले से होती है. इसके बाद गाने में आगे एसपी बालसुब्रमण्यम, सोनू निगम, शंकर महादेवन, कैलाश खेल, अनुप जलोटा, अनुराधा पौडवाल, कविता कृष्णमूर्ति, शान, उदित नारायण, पंकज उदास, अभिजीत जैसे मशहूर गायक भी जुड़ते चले जाते हैं. गाने को करीब 12 भाषाओं में तैयार किया गया है, जिसके लेखक प्रसून जोशी हैं. इस गाने को अब तक यू-ट्यूब पर 81 हजार से भी ज्यादा बार देखा जा चुका है. Asha Bhosle: जयतु जयतु भारतम् जयतु जयतु भारतम् वसुधैव कुटुम्बकम् विश्व प्रेम की ओढ़ चदरिया Shankar Mahadevan: जागा हुआ भारत है ये Sonu Nigam and Anup Jalota : विश्व प्रेम की ओढ़ चदरिया Hariharan, Suresh Wadkar, Talat Aziz, Amit Kumar, Shabbir Kumar and Shailendra : विश्व प्रेम की ओढ़ चदरिया सच्चे सुर में गाता है Alka Yagnik, Kavita Krishnamurthi, Anuradha Paudawal and Saapna : एक सुरीली आशा ले कर, सूरज नए उगाता है Taking a...

NILAMBER PITAMBER GREAT WORRIER

नीलाम्बर व पीताम्बर Nilamber and Pitamber were freedom fighters from Jharkhand. Two brothers had led a revolt against the East India Company in 1857. They were born in Chemo-Senya village to a family of the Bhogta clan of the Kharwar tribe in Latehar district. Their father Chemu Singh was Jagirdar. They decided to declare themselves independent from Company rule. They got inspired by Doronda revolt in Ranchi led by Thakur Vishwanath Shahdeo and Pandey Ganpat Rai. Chero Jagirdar Devi Baksh Rai joined them. On 21 October 1857, 500 people, led by Nilamber and Pitamber, attacked Raghubar Dayal at Chainpur who had sided with the British. Then, they caused heavy destruction at Lesliganj. Lt. Graham was not able to suppress the revolt with only 50 people on his side. Rebels besieged Lt. Graham in the house of Raghubar Dayal. In December, two companies under Major Cotter arrived and were able to capture Devi Bak...

Telanga Khadiya तेलंगा खड़िया

वीर महापुरूष तेलंगा खड़िया परिचय तेलंगा खड़िया की जीवनी अंग्रेजों के शोषण और अत्याचार से द्रवित हुए थे ते परिचय छोटानागपुर  के अनेक वीर महापुरूषों ने अंग्रेजों के शोषण के विरूद्ध भारत वर्ष के स्वतंत्रता  के लिए अपने जान की कुर्बानी दी और शहीद हुए। उन वीर महापुरूषों में तेलंगा खड़िया भी एक थे। जिन्होंने अंग्रेजों के शोषण अत्याचार के खिलाफ अपनी जान की कुर्बानी दी। तेलंगा खड़िया की जीवनी तेलंगा खड़िया का जन्म 9 फरवरी 1806 ई. में ग्राम – मुरगू, थाना – सिसई, जिला – गुमला (बिहार) में हुआ था। तेलंगा खड़िया एक साधारण किसान के घर में जन्म लिए थे। उनके पिता का नाम हुईया खड़िया और माता का नाम पेतो खड़िया था। कहा जाता है कि तेलंगा बचपन से ही वीर साहसी और अधिक वक्ता थे। वीर, साहसी एवं अधिक बोलने वाले व्यक्ति को खड़िया भाषा में तेsबलंगा कहते हैं। संभवता तेsबलंगा से ही तेलंगा हुआ। इनका शारीर हट्ठा – कट्ठा एवं सांवले रंग का था, तथा इनका ऊंचाई 5 फीट 9 ईंच था। तेलंगा खड़िया पढ़ा- लिखा नहीं था, परंतु वह एक कर्मठ समाजसेवी नेता था। इनकी शादी सन, 1846  ई. में कुमारी रतनी खड़िया से हुई थी...

TILKA MANJHI FIRST FREEDOM FIGHTER OF INDIA INDEPENDENCE

तिलका मांझी: भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का प्रथम स्वतंत्रता सेनानी साल 1857 में मंगल पांडे की बन्दुक से निकली गोली ने ब्रिटिश सरकार के खिलाफ़ विद्रोह का आगाज़ किया। इस विद्रोह को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का पहला विद्रोह माना जाता है और मंगल पांडे को प्रथम क्रांतिकारी। हालांकि, 1857 की क्रांति से लगभग 80 साल पहले बिहार के जंगलों से अंग्रेजी हुकुमत के खिलाफ़ जंग छिड़ चुकी थी। इस जंग की चिंगारी फूंकी थी एक आदिवासी नायक, तिलका मांझी ने, जो असल मायनों में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के पहले क्रांतिकारी थे। भले ही आपको हमारे इतिहास में तिलका मांझी के योगदान का कोई ख़ास उल्लेख न मिले, पर समय-समय पर कई लेखकों और इतिहासकारों ने उन्हें ‘प्रथम स्वतंत्रता सेनानी’ होने का सम्मान दिया है। महान लेखिका महाश्वेता देवी ने तिलका मांझी के जीवन और विद्रोह पर बांग्ला भाषा में एक उपन्यास ‘शालगिरर डाके’ की रचना की। एक और हिंदी उपन्यासकार राकेश कुमार सिंह ने अपने उपन्यास ‘हुल पहाड़िया’ में तिलका मांझी के संघर्ष को बताया है। आज द बेटर इंडिया के साथ पढ़िये तिलका मांझी उर्फ़ ‘जबरा...

वीरांगना सिनगी व कैली दई

https://youtu.be/lJc2gMXCwLA https://urlzs.com/BrJ7d आपने बहुत से स्वतंत्रता सेनानियों का नाम सुना होगा। हम सभी जानते है कि अंग्रेजों ने हम लोगों पर कितने अत्याचार किए हैष हम अपने ही देश में गुलामों की तरह रहने को मजबूर थे। वो समय था जब सिर्फ अंग्रेजी हुकूमत की ही चलती रही। कई बार तो ऐसा हुआ था कि लोगों को धूप में और सर्दी में नंगे बदन बैठाकर और काम करवाकर उनको खाना तक नहीं दिया जाता था। ऐसे में जो स्वतंत्रता सेनानी सामने आते थे उनको पकड़ने के बाद जानवरों की तरह सुलूक किया जाता था। वो दौर था जब अंग्रेज अपने मन का ही करते थे। कई स्वतंत्रता सेनानियों में कई वीर भी हुए। लेकिन आज हम जिनके बारे में आपको बताएंगे कि वो एक वीर नहीं बल्कि वीरांगना है। आप इनके बारे में शायद ही जानते होगे पर ये ऐसी वीरांगना थी जिनको देखकर अंग्रेज भी हैरान हो गए थे। आइए जानते है कि इनके बारे में. उरांव आदिवासी वीरांगना सिनगी दई छोटानागपुर क्षेत्र में स्थित रोहतासगढ़ में बसने से पूर्व उरांव जाति का इतिहास विस्मृति के धुंधलके में छिपा हुआ है और आधिकारिक तौर पर इससे पहले इनका जिक्र इतिहास के पन्नों तक में...

AMAR SAHID GANPAT ROY JOHAR JHARKHAND

अमर शहीद पाण्डेय गणपत राय परिचय   जीवनी आन्दोलन में सक्रियता परिचय बिहार का इतिहास हमेशा गौरवशाली रहा है और बिहारवासियों में राष्ट्रीयता की भावना किसी न किसी रूप में हमेशा विद्यामान रही है। प्राचीन काल से ही बिहार सामाजिक, राजनैतिक एवं धार्मिक चेतना का केंद्र बिन्दु रहा है। सन 1857 ई. की क्रांति जिसे प्रथम स्वतंत्रता संग्राम कहा जाता है, उसमें बिहार का प्रमुख योगदान रहा है। इस क्रांति की प्रथम चिनगारी प्रज्वलित करने वाला सिपाही मंगल पाण्डेय बिहार का ही निवासी था। इसी प्रकार सन 1857 की क्रांति में बिहार के बाबू कुँवर सिंह तथा उनके अनुज बाबू अमर सिंह, ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव, पाण्डेय गणपत राय, बिरसा मुंडा, शेख भिखारी नीलांबर – पीतांबर एवं टिकैत उमराँव सिंह आदि ने अपने – अपने क्षेत्र में अभूतपूर्व परिचय दिया। सन 1887 ई. की क्रांति में सभी वर्गों का सहयोग प्राप्त था। यहाँ कई छोटे – छोटे राज्य थे कभी स्वतंत्र रह चुके थे। अन्य क्षेत्रों की तरह छोटानागपुर भी अंग्रेजों के राजनैतिक, आर्थिक एवं धार्मिक शोषण के कारण भीतर ही भीतर सुलग रहे थे। इस मौके पर उन्हीं राजाओं ने तत्काल...