कहाँ तो तय था चरागाँ हर घर के लिए
कहाँ चराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए
झारखंड सरकार की वादाखिलाफी के करण झारखंड के लोग अँधेरे में रहने को मजबूर हैं। वादा था समृद्धि के सूर्योदय का पर मिला अमावस का अँधेरा। झारखंड विद्युत विभाग के कुप्रबंधन का खिमियाज़ा राज्य के लोगों अँधेरे में रह कर भुगतना पड़ रहा है।
माँग के अनुरूप नहीं हो पा रहा पर्याप्त उत्पादन
डीवीसी कमांड एरिया में ही 600 मेगावाट बिजली, जबकि डीवीसी कमांड एरिया के बाहर 1800 से 1900 मेगावाट तक बिजली की मांग है। कभी बिजली के कम उत्पादन तो कभी लोड बढ़ने की बात कह कर बिजली काटी जा रही है।
उद्योगपतियों का कहना है कि एक बार मशीन बंद होने पर
दूसरी बार मशीन चालू करने में लगभग 45
मिनट का समय लग जाता है। मशीन चालू रहने के दौरान बिजली
कटती है, तो उसमें फंसा माल लगभग 40 प्रतिशत खराब हो जाता
है।
राज्य में अधिकतम बिजली की मांग लगभग 2700 मेगावाट
है। जबकि जेबीवीएनएल को 2300
मेगावाट ही बिजली उपलब्ध हो पा रही है। बाकी बचे चार सौ
मेगावाट बिजली की भरपाई नहीं हो पा रही है।
जेबीवीएनएल को विभिन्न केंद्रीय विद्युत उत्पादन
उपक्रमों से कुल 1014.497 मेगावाट बिजली मिलती है। लेकिन अभी मात्र 757.39 मेगावाट
बिजली ही मिल रही है। एनटीपीसी के विभिन्न विद्युत उत्पादन उपक्रम से आवंटित 803.97 मेगावाट
के बदले मात्र 585.72 मेगावाट विद्युत आपूर्ति की जा रही है।
समाधान की बजाए विभाग बना रहा बहाने
हालाँकि बिजली विभाग के
वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि माँग के अनुरूप बिजली का उत्पादन हो रहा है। पावर कट की समस्या का मुख्य कारण राजधानी में पानी
की अंडरग्राउंड पाइपलाइन और टेलीफोन के तारों का बिछाया जाना है।
इसके अलावा खराब मौसम के कारण भी
एहतियातन घंटों तक बिजली काटी जाती है। ग्रामीण क्षेत्रों में भी स्थिति बहुत
अच्छी नहीं है। गर्मी में बढ़ते संसाधनों को पूरी बिजली उपलब्ध कराने के लिए
ग्रामीण क्षेत्रों में भी लोगों को घंटों पावर कट की समस्या से जूझना पड़ रहा है।
बिजली विभाग की ओर से कटौती सम्बन्धी
शिकायतों के लिए जारी किये गये नम्बर पर है शिकायतों की सुनवाई ही नहीं होती है।
सम्बंधित विभाग का ये लापरवाही भरा रवैया और उसको सरकार द्वारा नज़रअंदाज़ किये जाने के चलते जनता को भरी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है जो अब ना-काबिल-ए-बर्दाश्त होता जा रहा है।
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