झारखंड के महाकांड
चिलखारी नरसंहार’ की कहानी
गिरिडीह जिले से करीब 80 किलोमीटर दूर चिलखारी गांव स्थित है |
चिलखरी नरसंहार
चिलखरी गांव, जो झारखंड के गिरिडीह से लगभग 80 किलोमीटर दूर स्थित है, में 26 अक्टूबर 2007 की रात एक वार्षिक सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन हो रहा था। गांव के लगभग 15,000 लोग वहां इकट्ठा हुए थे, कार्यक्रम का आनंद ले रहे थे जिसमें विभिन्न प्रदर्शन, गाने, और नृत्य शामिल थे। लेकिन आधी रात के बाद एक अप्रत्याशित और भयावह घटना घटी, जिसने गांव को वर्षों तक दहला दिया। रात लगभग 1 बजे, पुलिस की वर्दी में कुछ लोग मंच पर पहुंचे। पहले तो भीड़ को लगा कि यह भी कार्यक्रम का हिस्सा है। लेकिन कुछ ही पलों में बंदूक की आवाजें गूंजने लगीं। हमलावरों, जिनकी संख्या 15 से 20 थी, ने भीड़ पर गोलियां चलाना शुरू कर दिया। अफरा-तफरी मच गई और लोग अपनी जान बचाने के लिए इधर-उधर भागने लगे। इस हंगामे के बीच, एक हमलावर ने झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी के भाई नुनूलाल मरांडी से आत्मसमर्पण करने की मांग की। लेकिन नुनूलाल वहां मौजूद नहीं थे। हमलावरों का मुख्य लक्ष्य नुनूलाल मरांडी थे, जो सरकार और स्थानीय समुदायों को नक्सली हिंसा के खिलाफ सुरक्षा संगठित करने में मदद कर रहे थे। लेकिन जब वे नुनूलाल को नहीं पा सके, तो उन्होंने भीड़ पर अंधाधुंध गोलियां बरसा दीं। इस हमले में 20 लोग मारे गए, जिनमें बाबूलाल मरांडी के बेटे अनुप मरांडी भी शामिल थे। बाद में पता चला कि हमलावर एक नक्सली गुट के सदस्य थे, जो ग्रामीण भारत में सक्रिय थे। चिलखरी गांव, जो कभी अपने फुटबॉल टूर्नामेंट्स और सामुदायिक आयोजनों के लिए जाना जाता था, उस हादसे के बाद शोक और दर्द का प्रतीक बन गया। सरकार ने घटना की याद में एक स्टेडियम बनाने का वादा किया था, लेकिन वर्षों बाद भी वहां कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ। उस मैदान में केवल दो कूड़ेदान लगाए गए, जो अधूरे वादों का प्रतीक बनकर रह गए। गांव के लोग उस रात की दर्दनाक यादों को आज भी संजोए हुए हैं। स्थानीय निवासी मुनशी हेमराम, जिन्होंने हमले को अपनी आंखों से देखा, उस भयावह घटना को आज भी कांपती आवाज में याद करते हैं। मुनशी ने उस रात एक रिश्तेदार को खो दिया, जो मरने से पहले बस पानी मांग रहा था और मुनशी की बाहों में ही दम तोड़ दिया। बचे हुए परिवारों के लिए यह एक दर्दनाक और कठिन जीवन बन गया है। जैसे कि सुखू मास्टर, जिन्होंने उस नरसंहार में अपने बड़े बेटे मनोज को खो दिया। सुखू मास्टर अब भी उन सपनों से जागते हैं जिसमें उनका बेटा जीवित होता है, लेकिन हर सुबह उसे निष्ठुर सच्चाई का सामना करना पड़ता है। घटना के बाद, कुछ ग्रामीणों ने मृतकों की याद में हर साल फुटबॉल टूर्नामेंट का आयोजन करने की कोशिश की, लेकिन जल्द ही उन्हें गांव में चेतावनियां दिखाई देने लगीं: "जो मरे हुए लोगों का सम्मान करेंगे, वे परिणाम भुगतेंगे।" डर के मारे समुदाय ने इस श्रद्धांजलि को छोड़ दिया। नक्सली हमला एक अलग घटना नहीं थी; चिलखरी नुनूलाल और उनके भाई बाबूलाल मरांडी के प्रयासों की वजह से नक्सलियों के निशाने पर था, जो गांव वालों की रक्षा के लिए एक स्थानीय रक्षा टीम बना रहे थे। नक्सलियों ने पहले ही 2005 में पास के गांव भेलवाघाटी में एक हमला कर 17 रक्षा दल के सदस्यों को बेरहमी से मार दिया था, ताकि नक्सल प्रभाव का विरोध करने वालों को एक चेतावनी मिल सके। चिलखरी की यह त्रासदी सिर्फ एक स्थानीय घटना नहीं है; यह झारखंड के कई गांवों को प्रभावित करने वाली हिंसा की एक काली याद है। हालांकि कुछ हमलावरों को मौत की सजा सुनाई गई थी, लेकिन वर्षों बाद उच्च न्यायालय ने सबूतों के अभाव में उन फैसलों को पलट दिया, और आरोपी रिहा हो गए। चिलखरी के निवासियों के दिलों में छोड़ा गया यह दर्द और त्रासदी आज भी जीवित है, और यह समुदाय अभी भी न्याय, उपचार और शांति की आशा में इंतजार कर रहा है।
The Massacre at Chilkhari In the remote village of Chilkhari, located about 80 kilometers from Giridih, Jharkhand, an annual cultural gathering was underway on the night of October 26, 2007. Villagers had gathered in large numbers—around 15,000 people—reveling in the performances, songs, and dances at this local event. However, just past midnight, an unexpected and horrifying incident took place that would haunt the village for years to come. Around 1 a.m., a group of men dressed in police uniforms stormed the stage. At first, the crowd thought it was part of the show. But within moments, the air was pierced with the sound of gunshots. The attackers, about 15 to 20 men, began firing on the crowd. Confusion turned to terror as people scrambled to escape. Amid the chaos, one of the assailants demanded that Nunulal Marandi, brother of Jharkhand’s former Chief Minister Babulal Marandi, surrender. Nunulal, however, was nowhere to be seen. Despite the attackers’ initial call for Nunulal, they soon unleashed indiscriminate violence, killing 20 people in the crowd, including Babulal Marandi's son, Anup Marandi. The attackers were identified as members of a Naxal group, a militant faction operating in rural India. Their mission was to eliminate Nunulal, who had been helping the government and local communities organize defenses against Naxal violence. Chilkhari had once been a peaceful village, known for its football tournaments and communal events. But in the aftermath of the massacre, the field where the tragedy occurred became a symbol of grief and trauma. The government had promised to build a stadium in remembrance, yet years later, the village saw little change. The only new additions to the grounds were two dustbins, a stark reminder of unfulfilled promises. Within the village, the pain of that night remains vivid. Local residents like Munshi Hemram, who witnessed the attack, still recount the memory with trembling voices. Munshi lost a relative that night, a young man who asked for water just moments before he died in Munshi’s arms. For the surviving families, life has been full of loss and hardship. For instance, Sukhu Master, who lost his eldest son Manoj in the massacre, still wakes from dreams where his son is alive, only to face the harsh reality each morning. Following the incident, some villagers tried to honor the victims by organizing an annual football tournament in their memory. But soon after, they found warnings posted around the village: "Those who honor the dead will face consequences." Out of fear, the community abandoned this tribute. The Naxal attack was not an isolated event; Chilkhari had been on their radar due to the efforts of Nunulal and his brother Babulal Marandi, who had created a local defense team to protect villagers from Naxal violence. The Naxals, angered by these efforts, had already staged an attack in a nearby village called Bhelwaghati in 2005. There, they brutally executed 17 members of the defense group to send a message to anyone resisting their influence. The tragedy of Chilkhari is more than a local memory—it is a dark reminder of the violence that has affected so many villages in Jharkhand. Although some attackers were sentenced to death, years later, the high court would reverse these decisions due to lack of evidence, freeing the accused. The loss and trauma left by this event, however, still linger in the hearts of Chilkhari's residents, a community left waiting for justice, healing, and perhaps, a day when peace will finally return to their village.
करीब 1 बजे पुलिस की वर्दी में 15-20 लोग मंच पर चढ़ जाते हैं। कुछ पल इधर-उधर देखते हैं, फिर फायरिंग करने लगते हैं। लोगों को लगता है कि ये नाटक का सीन है, लेकिन कुछ पल बाद ही चीख-पुकार मच जाती है। लोग बदहवास होकर भागने लगते हैं।
वर्दी पहने 40-45 साल का एक शख्स माइक पर अनाउंस करता है- ‘भागो मत… हम तुम लोगों को मारने नहीं आए हैं। हमें बाबूलाल मरांडी का भाई नुनूलाल मरांडी चाहिए। वो जहां भी है, खुद को हमारे हवाले कर दे।' पर नुनूलाल सामने नहीं आते हैं तो वो ताबड़तोड़ फायरिंग करने लगते हैं।
आगे की लाइन में बैठे 20 लोग मौके पर ही दम तोड़ देते हैं। झारखंड के पहले मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी के बेटे अनूप मरांडी भी मारे जाते हैं। पुलिस की वर्दी में आए ये लोग नक्सली थे, जो बाबूलाल मरांडी के भाई नुनूलाल को मारने आए थे।
चिलखारी गांव, गिरिडीह जिले के देवरी प्रखंड में पड़ता है। बिहार की सीमा भी इस गांव से लगती है। आस-पास कई छोटे-छोटे गांव हैं। यहां रहने वाले ज्यादातर आदिवासी हैं। रास्ते में मेरे ड्राइवर बता रहे थे कि अब इस एरिया के हालात बहुत हद तक बदल गए हैं। पहले यहां दिनदहाड़े नक्सली मार-काट मचाते थे। हालांकि, रात में अभी भी नक्सली यहां आते-जाते रहते हैं।
गांव के बाहर मुख्य सड़क से सटा एक लंबा चौड़ा मैदान है। ये वही चिलखारी मैदान है, जहां 17 साल पहले 20 लोगों का नरसंहार हुआ था। मैदान पर लंबी-लंबी घास उग आई है। मुझे दूर-दूर तक कोई नजर नहीं आ रहा। एकदम सूना मैदान। ऐसा लग रहा है कि ये ग्राउंड अपनी मनहूसियत से उबर नहीं पाया है।
पहले यह ग्राउंड फुटबॉल टूर्नामेंट के लिए मशहूर था। झारखंड के साथ ही बिहार के कई जिलों से भी खिलाड़ी यहां खेलने आते थे। सरकार ने घटना के बाद इसे स्टेडियम बनाने का वादा किया था।
‘’
ग्राउंड से सटा हुआ तीन कमरों का एक स्कूल है। दरवाजों पर ताला लटका हुआ है। ऐसा लगता है कि हाल के सालों में बना है। इसके ठीक बगल में एक पुराना स्कूल है, जो खंडहर हो चुका है। दीवारें दरक गई हैं। ऐसा लगता है यहां किसी ने आग लगा दी थी।
ये खंडहर कभी भी धराशायी हो सकता है। कमरे में ब्लैकबोर्ड बना है। जिसके बगल में लिखा है ‘सत्यमेव जयते, सब पढ़ें, सब बढ़ें।’ इन्हीं कमरों में चिलखारी नरसंहार में मारे गए लोगों का पोस्टमॉर्टम किया गया था।
बाहर दो नए डस्टबिन लगाए गए हैं। एक गीले कचरे के लिए और दूसरा सूखे कचरे के लिए। चिलखारी नरसंहार के बाद सरकार ने यहां मॉडर्न स्कूल बनाने का वादा किया था। जब गांव वालों ने मुझे सरकार के वादे के बारे में बताया तो मैं सोच में पड़ गया कि लोगों की भावनाओं के साथ इतना भद्दा मजाक कैसे किया जा सकता है।
मैदान से कुछ ही कदमों की दूरी पर चिलखारी गांव है। यहां करीब 150 परिवार रहते हैं। ज्यादातर घर टूटे-फूटे मिट्टी के हैं और कुछ घर पक्के।
गांव में घुसते ही मेरी मुलाकात मुंशी हेमराम से हुई। चिलखारी कांड का जिक्र करते ही बोल पड़ते हैं- ‘मेरे सामने ही घटना हुई। रात में डांस चल रहा था। नक्सली मंच पर चढ़े तो लगा ये लोग कोई डायलॉग बोलेंगे, लेकिन वो लोग गोली मारने लगा। लोग धांय-धांय गिरने लगे।’
मुंशी हाथ के इशारे से सामने की तरफ दिखाते हुए कहते हैं- ‘इसी जगह मेरा साला गिरा था। उसे गोली लगी थी। मुझसे बोला कि पहुना पानी दो। मैंने उसे पानी दिया, लेकिन तब तक वो मर चुका था।’
मरने वालों में इस गांव के कितने लोग थे?
मुंशी बताते हैं- ‘गांव से तो दो-तीन लोग ही मरे। बाकी लोग बगल के गांवों से थे। कुछ लोग बिहार के भी मरे थे।’
मुंशी ने बताया कि दो मृतकों का परिवार गांव छोड़ चुका है। एक सुखू मास्टर ही गांव में रहते हैं, जिनका बड़ा बेटा मारा गया था।
सुखू मास्टर का घर कहां है?
यहां से करीब 2 किलोमीटर दूर उनका घर है। बुढ़वाडीह टोला में वे रहते हैं।
इसके बाद मैं सुखू मास्टर के घर पहुंचा। हाल-फिलहाल में बना पक्का घर। द्वार पर ही सुखू मास्टर मिल गए। गले में सफेद गमछा और चादर ओढ़े सुखू चिलखारी हत्याकांड का जिक्र होते ही घबरा जाते हैं। कहते हैं- ‘कोई इन्क्वायरी वगैरह तो नहीं बैठ रही। कौन हैं आप?’
मैंने सुखू को बताया- ‘पत्रकार हूं, चिलखारी हत्याकांड पर स्टोरी करने आया हूं। मुझे पता चला कि उस कांड में आपका बेटा भी मारा गया था।’
सुखू मुझे घर के अंदर बुलाते हैं। आंगन में कुर्सियां लगाते हैं और कहानी बताना शुरू करते हैं।
आखें डबडबाई हुईं, जुबान लड़खड़ा रही, खुद को संभालते हुए सुखू कहते हैं- ‘रात में अचानक मुझे पटाखे की आवाज सुनाई पड़ी। बेटी दौड़ते हुई आई। बोली पापा भगदड़ मच गई है। बाहर निकला तो देखा कि लोग इधर-उधर भाग रहे हैं। भागो, भागो गोली चल रही कहते हुए लोग गिरते-भागते जा रहे थे।
मेरे बेटे के ससुर भी कार्यक्रम देखने गए थे। वो मुझे देखते ही बोले अनर्थ हो गया। मैंने पूछा क्या हो गया, तो बोलते हैं कि चलिए चलकर देखते हैं। वहां गया तो देखा मेरा बेटा कुर्सी पर मरा पड़ा है। मुझे तो कुछ समझ में ही नहीं आ रहा था कि क्या हुआ। बड़ा बेटा थो वो मेरा। मनोज नाम था उसका। वो भी कार्यक्रम की कमेटी में था। इसीलिए आगे की लाइन में बैठा होगा।’
थोड़ी देर ठहरकर कहते हैं- ‘आज रात भी वो सपने में आया था। मैंने देखा कि मेरे दोनों बेटे साथ में काम कर रहे हैं। खेत में मिट्टी कोड़ रहे हैं।’
सुखू की बहू को सरकारी नौकरी और एक लाख रुपए की मदद सरकार से मिली है। वो गिरिडीह में रहती हैं और वहीं उनके बच्चे भी पढ़ते हैं। पति की मौत के बाद उन्होंने देवर से शादी कर ली, जो गांव में खेती-बाड़ी का काम संभालते हैं।
सुखू के बगल में खड़े अर्जुन मुर्मू कहते हैं- ‘मैं तब 17-18 साल का था। दिन में फुटबॉल टूर्नामेंट का फाइनल हुआ और रात में नाच-गाने का प्रोग्राम था। मैं दूसरी पंक्ति में बैठा था। कुछ नक्सली पुलिस की वर्दी में थे और कुछ महिलाओं के वेश में साड़ी पहने हुए।
उन लोगों ने जब गोली चलाना शुरू किया तो हमें लगा कि ये सब रोल कर रहा है, लेकिन जब आगे बैठे लोगों को लुढ़कते देखा तो हम लोग भी भागने लगे। फिर तो भगदड़ ही मच गई।
सुबह जब मैं मैदान में पहुंचा तो देखा कि लाशें ही लाशें पड़ी हैं। ऐसा लग रहा था जैसे देवी मां को बलि दी गई हो। बहुत डरावना सीन था। उस घटना के बाद कई दिनों तक लोग जरा सा शोर-गुल सुनकर दिन में भी भागने लगते थे। पूरे इलाके में दहशत फैल गई थी।’
घटना के दो साल बाद गांव के लोगों ने फिर से फुटबॉल टूर्नामेंट शुरू करने का फैसला किया। टूर्नामेंट का नाम चिलखारी हमले में मारे गए लोगों के नाम पर रखा। गांववालों ने उन्हें शहीद कहना शुरू कर दिया। अगले दिन गांव में जगह-जगह नोटिस चस्पा मिले- ‘जिस पर लिखा था- मरने वाले लोगों को शहीद कहा और उनके नाम पर टूर्नामेंट कराया, तो हमसे बुरा कोई नहीं होगा।’
गांव वाले मरने वालों की याद में फुटबॉल टूर्नामेंट कराने की हिम्मत आज तक नहीं जुटा पाए हैं।
नक्सलियों ने नरसंहार किया क्यों? इस सवाल का जवाब गांव का बच्चा-बच्चा जानता है, लेकिन कोई बताने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा। उनके मन में आज भी नक्सलियों का खौफ जस का तस है। ऐसा खौफ कि कई पीड़ित बेटा- भाई गंवाने के बाद भी गवाही की हिम्मत नहीं जुटा पाए।
सुखू मास्टर कहते हैं- ‘जब बेटा ही चला गया तो क्या केस-फेस करें। किससे इंसाफ मांगें, क्या इंसाफ मांगें, मुझे किसी से कोई शिकायत नहीं है।’
नक्सलियों के टारगेट पर नुनूलाल मरांडी थे। मैंने नुनूलाल को फोन लगाया तो उन्होंने मुझे गिरिडीह बुलाया। अगले दिन मैं गिरिडीह में उनके घर पहुंच गया। वो चुनाव की सरगर्मी में व्यस्त थे। उनके पास कुछ कार्यकर्ता भी बैठे थे। करीब एक घंटा इंतजार करने के बाद नुनूलाल से मुलाकात हुई।
नुनूलाल मुझे चिलखारी नरसंहार की आंखों-देखी सुनाते हैं...
'आठ-दस साल से चिलखारी मैदान में फुटबॉल टूर्नामेंट हो रहा था। हर बार मैं चीफ गेस्ट बनता था। उस रोज फाइनल मैच था। मैंने वहां जाने से पहले SP को लिखित में दिया था कि मुझे सिक्योरिटी प्रोवाइड कराइए, क्योंकि वो नक्सल प्रभावित इलाका है, लेकिन मुझे सिक्योरिटी नहीं मिली।
दिन में खिलाड़ियों को इनाम-वगैरह बांटने के बाद मैं गिरिडीह आने के लिए चिलखारी से निकलने वाला ही था कि कमेटी वालों ने फोन कर दिया। उन्होंने बताया कि सर रात में संथाली यात्रा कार्यक्रम है, उसमें आपको रहना है। मैंने कहा कि दिन में तो मैं था ही, रात में गांव के प्रधान वगैरह से कार्यक्रम का उद्घाटन करा लेना।
इस पर उन लोगों ने कहा- नहीं सर आपको ही फीता काटना है। मैं रुक गया। मेरे साथ मेरा भतीजा अनूप मरांडी भी था। वो मेरे साथ ही रहता था। 6 महीने पहले ही उसकी शादी हुई थी। जब मैं कार्यक्रम की शुरुआत में भाषण दे रहा था, तब कुछ लोगों ने आवाज देकर कहा कि सर आप आगे आ जाओ, आप दिख नहीं रहे हो।
मैंने कमेंट भी किया कि मैं कोई हीरो तो हूं नहीं कि आप लोग मुझे देखना चाहते हैं, लेकिन वो लोग मुझे आगे बुला लिया। शायद वो मुझे आइडेंटिफाइ करने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन मुझे कुछ पता नहीं चला।
कार्यक्रम का उद्घाटन करने के बाद मैं मंच से उतरकर नीचे आ गया। आगे की लाइन में कुर्सी पर बैठ गया। मेरे बगल में एक लड़की बैठी हुई थी। काली साड़ी पहनी थी। वो मुझे बार-बार नोटिस कर रही थी। फिर उठकर पीछे चली गई। रात में एक बजे के करीब मैंने देखा कि वो लड़की बार-बार किसी से बात कर रही है। मुझे थोड़ा अजीब लगा, लेकिन फिर मैंने ध्यान नहीं दिया।
इसी बीच कुछ लोग मंच पर चढ़ गए। उन लोगों ने मेरी तरफ बंदूक करके गोली मारी, लेकिन गोली बगल में बैठे एक लड़के की आंख में लग गई। वो मौके पर ही मर गया। उसके हाथ में मेरी लाइसेंसी बंदूक थी। मैंने जैसे ही देखा कि वो मर गया, मैं कूद कर पीछे भागा। इसके बाद तो वो लोग फायरिंग करने लगे।। भगदड़ मच गई।
इसी बीच तीन लोग और मंच पर चढ़े और अनाउंस किया कि हमें बस नुनूलाल मरांडी से मतलब है। उसे पकड़कर हमारे हवाले कर दो। वो काला कोट और चश्मा पहना हुआ है। इतना सुनते ही मैंने शर्ट, कोट फाड़कर फेंक दिया। चश्मा और घड़ी भी फेंक दी। जूता वगैरह सब कुछ फेंक दिया।
इसके बाद मंच के साइड से कूदकर बाकी लोगों के साथ मैं भी भागने लगा। भागकर मैं एक दूसरे गांव में गया। वहां एक मंदिर में कुछ देर रुका। समझ नहीं आ रहा था कहां जाऊं, क्या करूं, पता नहीं किस गांव में कौन उग्रवादी छिपा है। तभी मैंने देखा कि कुछ लोग बात करते हुए जा रहे हैं कि उग्रवादी सब आया था। बाबू लाल मरांडी के भाई को मार दिया है।
उन लोगों को पता नहीं था कि मैं बच गया हूं। भटकते-भटकते मैं एक परिचित के घर पहुंचा। उनके घर से मैंने SP को फोन किया। मैंने SP से कहा कि अगर आपने सिक्योरिटी दी होती, तो इतनी बड़ी घटना नहीं होती।
उसके बाद तीन थाने की पुलिस चिलखारी आई। पुलिस मुझे घटनास्थल लेकर गई। अब तक मुझे नहीं पता था कि मेरा भतीजा अनूप कहां है। मुझे लग रहा था कि वो भी कहीं भाग गया होगा। मैंने वहां देखा कि जो लोग जैसे बैठे थे वैसे ही मारे गए थे। तभी मेरी नजर भतीजे अनूप पर पड़ी। वो भी कुर्सी पर लुढ़क गया था।
अनूप को देखकर मैं अंदर से पूरा हिल गया। सोचने लगा कि भैया को क्या मुंह दिखाऊंगा। 6 महीने पहले ही अनूप की शादी हुई थी, उसकी पत्नी को कैसे मुंह दिखाऊंगा।
मेरी हिम्मत नहीं हो रही थी भैया को फोन करने की। समझ नहीं आ रहा था उनसे क्या बोलूं। बात भी करूं तो क्या बात करूं, किस मुंह से बात करूं। बहुत हिम्मत करके मैंने उन्हें फोन किया। तब वे रांची में थे। मैंने कहा- भैया ऐसा-ऐसा हो गया है। मैं अनूप को नहीं बचा पाया। इतना सुनते ही वे रांची से चिलखारी के लिए निकल पड़े। सुबह वे और बाकी नेता मैदान पहुंचे थे।'
नक्सलियों ने आपको क्यों टारगेट किया था?
नुनूलाल बताते हैं- 'इसकी लंबी कहानी है। गिरिडीह और झारखंड के कई गांवों में नक्सलियों ने लोगों का जीना मुश्किल कर दिया था। जब मन किया नक्सली गांव वालों के घर धमक आते थे। भरपेट खाते थे। गाली देते थे। महिलाओं के साथ गलत करते थे। गांव वाले नक्सलियों से परेशान थे।
मुख्यमंत्री रहते बाबूलाल मरांडी ने नक्सलियों की हालत खराब कर दी थी। उसके बाद उन्होंने ग्राम रक्षा दल बनाया और गांव के लोगों को नक्सलियों के खिलाफ लड़ने के लिए तैयार किया। मैं भी उस मुहिम से जुड़ा था।
हम लोग गांव के लड़कों को पारंपरिक हथियार, लाठी और टॉर्च देते थे, ताकि जब उनके गांव में नक्सली घुसें तो वे उन्हें भगा सकें। नक्सली इससे बहुत परेशान थे। चिलखारी से पहले भेलवाघाटी में नक्सलियों ने ग्राम रक्षा दल के लोगों का नरसंहार किया था।’
क्या हुआ था भेलवा घाटी में, नुनूलाल उस नरसंहार के बारे में बताते हैं…
11 सितंबर 2005 की बात है। चिलखारी से करीब 20 किलोमीटर दूर भेलवाघाटी गांव है। शाम के करीब साढ़े सात बजे होंगे। नक्सलियों ने गांव पर धावा बोल दिया। लोग भाग नहीं पाए, क्योंकि सबके दरवाजे पर बाहर से कुंडी लगा दी थी। फिर ग्राम रक्षा दल के एक-एक सदस्य को घर से बाहर निकालकर बीच चौराहे पर खड़ा करने लगे।
ग्राम रक्षा दल के कुछ सदस्य गांव से बाहर थे। जब उन्हें पता चला कि नक्सलियों ने धावा बोला है, तो वे मक्के के खेतों और मस्जिद में छिप गए। नक्सलियों को इसकी भनक लग गई। उन्होंने मस्जिद के ऊपर बम फेंक दिया। फिर अंदर घुस गए और ग्राम रक्षा दल के सदस्यों को घसीटते हुए बाहर लाए।
नक्सलियों ने बीच चौराहे पर ही जन अदालत लगाई और ग्राम रक्षा दल के सदस्यों को जान से मारने का फरमान सुनाया। नक्सलियों ने पहले इन लोगों को बेरहमी से पीटा, फिर किसी को गोली मारकर तो किसी का गला रेतकर हत्या कर दी। कुल 17 लोगों को नक्सलियों ने मौत के घाट उतार दिया। इनमें 12 मुस्लिम थे।
नुनूलाल कहते हैं- ‘भेलवाघाटी में नक्सली जब ग्राम रक्षा दल के सदस्यों को मार रहे थे तो मेरा और भैया बाबू लाल मरांडी का नाम लेकर मार रहे थे। उन लोगों ने गांव वालों से कहा था कि बाबूलाल और नुनूलाल का साथ नहीं छोड़ा, तो यहीं अंजाम होगा।’
गिरिडीह की अदालत ने 23 जून, 2011 को रंगकर्मी जीतन मरांडी, मनोज रजवार, छत्रपति मंडल और अनिल राम को फांसी की सजा सुनाई थी।
निचली अदालत के फैसले को जीतन मरांडी ने झारखंड हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। झारखंड हाईकोर्ट की डबल बेंच ने 15 दिसंबर 2011 को जीतन मरांडी समेत चारों को निर्दोष करार देते हुए फांसी की सजा से बरी कर दिया था। दरअसल पुलिस ने जिस जीतन मरांडी को गिरफ्तार किया था, वो नक्सली नहीं बल्कि एक रंगकर्मी था।
हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ झारखंड सरकार सुप्रीम कोर्ट भी गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को ही बरकरार रखा था। अभी तक 10 अभियुक्त इस मामले में बरी हो चुके हैं।
------






Comments
Post a Comment
I have a doubt please let me check