Skip to main content

chhath Pooja why ?when?

शीतली बयरिया शीतल दूजे पनीया
कब देब देवता तू आके दरसनिया
जोड़े जोड़े सूपवा आदित देव
घटवा पे तीवई चढ़ावेले हो
जल बिच खड़ा होई दर्शन ला आसरा लगावेले हो!

सूर्य की स्वर्णिम किरणों में जब इस लोकगीत के बोल गूंजते हैं तब पूरा वातावरण भक्ति, अनुशासन और लोकश्रद्धा से भर उठता है। छठ पर्व केवल एक व्रत नहीं, बल्कि प्रकृति और जीवनदायिनी सूर्य शक्ति के प्रति कृतज्ञता का उत्सव है। यह पर्व छठ माता, जल, मिट्टी और सूर्य इन चार तत्वों की एकात्म साधना है।

हर वर्ष कार्तिक शुक्ल चतुर्थी से सप्तमी तक मनाया जाने वाला यह पर्व अपने भीतर असीम संयम, श्रद्धा और लोकपरम्परा का भाव समेटे है। बिहार, झारखंड, उत्तरप्रदेश से लेकर देश–विदेश तक फैला इसका उत्साह भारत की मजबूत सांस्कृतिक जड़ों को दिखाता है। आइए इस महापर्व से जुड़ी मान्यताओं और परम्पराओं के बारे में विस्तार से जानने का प्रयास करें।

पहला दिन- नहाये खाए यह तैयारी का दिन माना जाता है । इसमें स्नान के बाद ही भोजन बनाना आरम्भ किया जाता है इसलिए इसे नहाये खाए के नाम से जाना जाता है । इस दिन शरीर और मन दोनों की ही शुद्धता का विशेष ध्यान रखा जाता है । इस दिन लौकी/कद्दू की सब्जी, चने की दाल और चांवल पकाना आवश्यक होता है । सब तैयार करने के बाद सूर्य देव को भोजन अर्पित किया जाता है ।

दूसरा दिन- इस दिन की विशेषता है खरना पूजा । यह नहाये खाए के बाद का दिन होता है जिसमे महिलाएं सुबह से निर्जला व्रत रखती हैं । सुबह उठकर सबसे पहले सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है उसके बाद मिट्टी का नया चूल्हा बनाया जाता है जिसके लिए सबसे पहले उस स्थान की निश्चिती की जाती है जहाँ चूल्हा बनाया जाना है उसके बाद उस स्थान को बहुत अच्छी तरह से साफ़ किया जाता है । इसमें पारंपरिक मिट्टी का चूल्हा बनाया जाता है । फिर शाम के समय पुनः स्नान करके रोटी और गुड़ की खीर बनाई जाती है ।



फिर छठ माता को केले के पत्ते पर भोग लगा या जाता है जिसके सामने पांच पान के पत्तों पर मिट्टी के दिए रखे जाते है घी की बाती भरकर उसे जलाया जाता है । तत्पश्चात निर्जला व्रत रखने वाली महिलाएं व्रत का पारण करती हैं । फिर घर आये सभी मेहमानों को छठ का प्रसाद बांटा जाता है और महिलायें एक दुसरे को सिन्दूर का टिका लगाती हैं ।

इसके बात छठ उत्सव का तीसरा दिन आता है जिसमे सुबह 3-4 बजे उठकर सूर्योदय से पहले ही ठेकुआ बनाने का कार्य आरम्भ हो जाता है । ठेकुआ छठ महापर्व का महाप्रसाद है। इसके बाद सारा दिन  जमकर शाम की तैयारी की जाती है। इस दिन सूर्यास्त तक नदी के घाटों पर बहुत भीड़-भाड़ हो जाती है सभी सूर्यास्त से पहले ही घाट पर जाकर अपना स्थान सुरक्षित कर लेते हैं ताकि अच्छे से अस्ताचल होते हुए सूर्य को अर्घ्य दे सकें । वैसे तो यह पर्व देशभर में मनाये जाने के साथ-साथ विदेशों में भी धूमधाम से मनाया जाता है लेकिन विशेष रूप से बिहार, झारखंड और उत्तरप्रदेश में इसकी छटा देखते ही बनती है।



मान्यता है कि इस पर्व में पूजी जाने वाली छठी मैय्या संतान की सदैव ही रक्षा करती हैं । कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष के चतुर्थी से सप्तमी तिथि तक छठ महाव्रत मनाया जाता है। इसमें भगवान सूर्यदेव की पूजा होती है।छठ व्रत खासतौर पर पुत्र प्राप्ति के लिए किया जाता है।


छठी मैय्या 

छठ व्रत सबसे महत्त्वपूर्ण रात्रि कार्तिक शुक्ल षष्ठी तिथि को होता है। सूर्योपासना का यह महापर्व चार दिनों तक मनाया जाता है। छठ पर्व के लिए कई कथाएं प्रचलित हैं, किन्तु पौराणिक शास्त्रों में इसे देवी द्रौपदी से जौड़कर देखा जाता है । मान्यतानुसार जब पांडव द्यूतक्रीड़ा में सबकुछ गंवा चुके थे तब द्रौपदी द्वारा छठ का कठिन व्रत किया गया तब जाकर पांडवों को अपना राजपाट पुनः प्राप्त हो सका।


पांडवों और कौरवों के मध्य आयोजित द्यूतक्रीड़ा

एक अन्य कथा यह कहती है की लंकाविजय के पश्चात रामराज्य की स्थापना कार्तिक शुक्ल षष्ठी तिथि को ही हुई और इस दिन प्रभु राम और माता सीता ने सूर्यदेव को कृतज्ञता ज्ञापित करते हुए सूर्य की आराधना की जबकि एक और मान्यतानुसार छठ पूजा का आरम्भ कर्ण द्वारा माना जाता है।

कहा जाता है की वह सूर्यदेव का परम भक्त था वह प्रतिदिन घंटो कमर तक पानी में डूबकर सूर्यदेव की आराधना करता और उन्हें अर्घ्य देता और उन्हीं की कृपा से वह इतना महान योद्धा बना । आज भी अर्घ्य उसी पद्धति से दिया जाता है जैसा की इस कथा में वर्णित है ।

इस पर्व से सम्बंधित मान्यतायें कुछ भी हो, चाहे कितनी ही कथायें इससे जुड़ी हों इस पर्व के पीछे निहित दर्शन है पृथ्वी पर जीवन देने और उसे चलायमान रखने में अहम् भूमिका निभाने वाले सूर्य देव के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करना। उत्सव के इन दिनों में महिलाएं सारे व्रत-नियमों का अनुशासन से पालन करती है और अपने परिवार और संतान के लिए सुख, समृद्धि की मंगल  कामना करती हैं।

इस पूजोत्सव में घर के पुरुष भी बराबरी से भागीदारी करते हैं और पूरी श्रद्धा से इस उत्सव को मनाते हैं । जब हम सनातन की परम्पराओं को ध्यान से देखते हैं तब पाते है सबके मूल में जीवनदायिनी माँ प्रकृति के विभिन्न तत्वों के प्रति सम्मान और श्रद्धा ज्ञापित करना यही भाव निहित है। आप सभी को छठ पर्व की हार्दिक शुभकामनायें !

Comments

Popular posts from this blog

chinta haran mantra

* चिंता हरण मन्त्र * आनन्द कर निज रूप में, चिन्ता अग्नि में क्यों जरं । जो हो गया सो हो गया, पश्चाताप कर कर क्यों मरै । जो हो रहा सो हो रहा, आगे की चिन्ता क्यों करै । तू सत्य है तू नित्य है, जो नाश है निश्चय मरे ||१|| संतुष्ट होगा जो कभी, वह देह का पोषण करे । यदि रुष्ट होगा वह कभी, तो देह का शोषण करें । मन देह इन्द्री पार तू, आशा किसी की क्यों करे । है मार सकता देह को, तन पार फिर तू क्यों डरें ॥२॥ यदि द्व ेष कर्ता है कहीं, तो आपने से कर रहा । यदि प्रेम करता है कहीं, तो आपने से कर रहा । फल प्रेम का सुख द्व ेष का दुःख, प्राप्त कर जन्मै मरे । कर्त्ता न बन भोक्ता न बन, सुख दुःख में फिर क्यों परै ३ संसार के व्यवहार को, तू स्वप्न जैसा जान ले । संसार के व्यवहार में, जो लिप्त सोया मान ले । तू जाग जा निज रूप में, सोये की संगति क्यों करें । तू जागता जीता भला, फिर संग मुर्दा क्यों धरै ॥४॥ आदर्श रख मुनि सन्त का शुरु दत्त का सनकादिका । या राम का या कृष्ण का, गांधी तथा जनकादिका । कुत्ता गधा बन्दर तथा सूकर नकल तू क्यों करें । सिख मान गँवानन्द का, तू आत्म का चिन्तन करे ||५|| *Worry removal mantra* ...

बिन आमदनी आदिवासियों का जीना दुश्वार

  बिन आमदनी आदिवासियों का जीना दुश्वार जिम्मेदार कौन है , बताइए सरकार जल , जंगल और ज़मीन के इस झारखंड की पहचान हैं ये आदिवासी | ये आदिवासी ही झारखण्ड की संस्कृति के वाहक और संरक्षक हैं | पर आज ये तथाकथित ' आदिवासियों की हितैषी ' सरकार भी झारखण्ड में आदिवासियों के हितों की रक्षा कर पाने में असमर्थ है | हाल ही में प्रोफेशनल असिस्टेंस फॉर डेवलपमेंट एक्शन (प्रदान) द्वारा जारी की गयी रिपोर्ट में ये खुलासा हुआ है कि झारखंड में 75 फीसदी से भी ज्यादा आदिवासी परिवार ऐसे हैं जिनकी सामूहिक आय 5000 रूपये प्रति माह से भी कम है | भारत सरकार के केन्द्रीय जनजाति मंत्रालय और झारखंड सरकार के कल्याण विभाग को सौंपी गयी इस रिपोर्ट में बताया गया है कि झारखंड के एक आदिवासी परिवार की कुल आया प्रतिवर्ष 60000 के आस पास है |   ·        झारखण्ड सरकार की पक्षपातपूर्ण नीतियों के कारण झारखण्ड का आदिवासी समुदाय आज हर तरह की सुविधाओं से वंचित है और अन्धकार में अपनी गुज़र बसर करने को मजबूर है | केंद्र सरकार द्वारा आवंटित की गयी वो राशि जो आदिवासी कल्याण कोष में जानी चाहिए थी...